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जेपी की जयंती : आज भी अंधेरी कोठरी में रोशनदान की तरह हैं लोकनायक

Posted By : Admin ,          670 0 Comments
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भोज भूमि : आज लोकनायक जयप्रकाश नारायण की जयंती है, लेकिन ये बेहद दुर्भाग्य की बात है कि आज की युवा पीढ़ी बॉलीवुड के महानायक का जन्मदिन तो याद रखती है, पर लोकनायक की जयंती भूल जाती है। ऐसे में 'भोजभूमि' के संपादक देवेंद्र तिवारी का यह खास आलेख जेपी की स्मृतियों को संजोने का एक छोटा प्रयास है।
खलक खुदा का, मुलुक बाश्शा का / हुकुम शहर कोतवाल का... / हर खासो-आम को आगह किया जाता है / कि खबरदार रहें / और अपने-अपने किवाड़ों को अन्दर से / कुंडी चढा़कर बन्द कर लें /गिरा लें खिड़कियों के परदे /और बच्चों को बाहर सड़क पर न भेजें /क्योंकि, एक बहत्तर बरस का बूढ़ा आदमी अपनी काँपती कमजोर आवाज में/सड़कों पर सच बोलता हुआ निकल पड़ा है ! धर्मवीर भारती ने मुनादी नाम से ये कविता नंवबर 1974 में जयप्रकाश नारायण को लेकर तब लिखी जब इंदिरा गांधी के दमन के सामने जेपी ने झुकने से इंकार कर दिया। वे इंदिरा गांधी के करप्शन और तानाशाही के खिलाफ सड़क से आंदोलन की अगुवाई कर रहे थे, तो देश में नारा लगने लगा कि सिंहासन खाली करो कि जनता आती है। आज लोकनायक के नाम से मशहूर उसी जेपी की जयंती है। लेकिन ये बेहद दुर्भाग्य की बात है कि आज की युवा पीढ़ी बालीवुडिया महानायक के जन्मदिन को तो याद रखती है लेकिन उसे लोकनायक की जयंती याद नहीं है। ऐसे में 'भोजभूमि' का यह खास आलेख जेपी की स्मृतियों को संजोने का एक छोटा प्रयास है।

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स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी करने वाले, सर्वहारा के हक के लिए जोरदार ढंग से आवाज उठाने वाले, इंदिरा गांधी की सत्ता को हिलाने वाले, आजादी के बाद सामाजिक समानता के सबसे बड़े पैरोकार और बगावती मिज़ाज के जेपी भोजपुरी माटी में ही पैदा हुए थे। गंगा और सरयू के संगम सिताब दियरा जो बिहार और यूपी की भौगोलिक सीमा पर है, के लाला टोले में 11 अक्टूबर, 1902 को जयप्रकाश नारायण का जन्म हुआ था। जेपी को उस नेता के तौर पर याद किया जाएगा जिसने 72 बरस की उम्र में संघर्ष वाहिनी से लेकर तमाम युवाओं को ही सड़क पर खड़ा कर उन्हीं के हाथ संघर्ष की मशाल थमा दी। और मशाल थामने वालों को ये भरोसा था कि यदि माना कि कोई गलत रास्ता पकड़ेंगे तो जेपी रास्ता दिखाने के लिये हैं। तभी तो हिंदी के मशहूर गजलगो दुष्यंत लिखते हैं-
     एक बूढ़ा आदमी है मुल्क में या यों कहो- इस अँधेरी कोठरी में एक रोशनदान है।

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जयप्रकाश का बिगुल बजा तो जाग उठी तरुणाई है-इसी संकल्प के साथ 1977 में सत्ता परिवर्तन हुआ। आज संपूर्ण क्रांति के क़रीब 45 साल बाद भी हम उस क्रांति के निर्धारित लक्ष्यों के तरफ एक कदम भी नही बढ़ सके हैं। बल्कि मौजूदा दौर में सत्य तो यह है कि सम्पूर्ण क्रांति के योद्धाओं के हाथ जब भी सत्ता आई तो ये कांग्रेस के भ्रष्टाचारियों से भी ज्यादा भ्रष्ट हुए। इन्होंने निर्लज्जता और बेशर्मी की सारी हदें पार भी कर दी। तो ऐसे में सवाल यही है कि क्या हम जेपी को श्रद्धांजलि देने के लायक भी हैं? आज हम जेपी के सत्तादारी अनुयायियों की फेहरिस्त को परखें तो लालू यादव, रामविलास पासवान, राजनाथ सिंह , रविशंकर प्रसाद, अश्विनी चौबे, नीतीश कुमार से लेकर नरेन्द्र मोदी ही नहीं बल्कि मौजूदा केन्द्र में दर्जनों मंत्री और बिहार-यूपी और गुजरात में मंत्रियों की लंबी फेरहिस्त मिल जायेगी जो खुद को जेपी का अनुनायी बताते हैं। ये उनके संघर्ष में साथ खडे होने की बात भी कहेेंगे। आज हम जेपी की जयंती तो मना रहे हैं। मगर ये याद रखने की बात है कि जब मुनादी हो तब धर्मवीर भारती की कविता 'मुनादी' के शब्द याद रहे-
         बेताब मत हो / तुम्हें जलसा-जुलूस, हल्ला-गुल्ला, भीड़-भड़क्के का शौक है / बादश्शा को हमदर्दी है अपनी रियाया से / तुम्हारे इस शौक को पूरा करने के लिए / बाश्शा के खास हुक्म से / उसका अपना दरबार जुलूस की शक्ल में निकलेगा / दर्शन करो ! /वही रेलगाड़ियाँ तुम्हें मुफ्त लाद कर लाएँगी / बैलगाड़ी वालों को दोहरी बख्शीश मिलेगी / ट्रकों को झण्डियों से सजाया जाएगा /नुक्कड़ नुक्कड़ पर प्याऊ बैठाया जाएगा / और जो पानी माँगेगा उसे इत्र-बसा शर्बत पेश किया जाएगा / लाखों की तादाद में शामिल हो उस जुलूस में / और सड़क पर पैर घिसते हुए चलो / ताकि वह खून जो इस बुड्ढे की वजह से / बहा, वह पुँछ जाए ! / बाश्शा सलामत को खून-खराबा पसन्द नहीं !.